5. वैदिक काल: ऋग्वैदिक

वैदिक काल: यह आद्यैतिहासिक काल के अंतर्गत आता है। माना जाता है कि वेदों की रचना ईश्वर द्वारा हुई (अपौरुषेय)। वैदिक साहित्य के दो अन्य नाम नित्य साहित्य और संहिता हैं।

काल विभाजन:
1. ऋग्वैदिक काल: 1500 BC – 1000 BC (जानकारी केवल ऋग्वेद से मिलती है)
2. उत्तर वैदिक काल: 1000 BC – 600 BC (जानकारी सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, आरण्यक और उपनिषद से मिलती है)

A. वैदिक काल की प्रारंभिक जानकारी के स्रोत

  • बोगाजकोई अभिलेख: वैदिक काल की सबसे पहली जानकारी एशिया माइनर (तुर्की) स्थित बोगाजकोई अभिलेख (1400 ई.पू.) से मिलती है। इसमें 4 देवताओं का उल्लेख है: इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य
  • वेदों की संख्या (4): ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। प्रथम तीन वेदों को सम्मिलित रूप से ‘वेदत्रयी’ कहा जाता है। (अथर्ववेद को वेदत्रयी में शामिल नहीं किया जाता)।
  • ब्राह्मण ग्रंथ: वेदों को सरल भाषा में आम लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘गद्य’ रूप में लिखे गए ग्रंथ।
  • आरण्यक ग्रंथ: गुरु द्वारा जंगलों में शिष्यों को दिया गया ज्ञान। इन्हें ‘वन पुस्तक’ भी कहते हैं।
  • उपनिषद ग्रंथ: एकांत में गुरु के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करना। इसका अन्य नाम ‘वेदांत’ भी है। कुल उपनिषदों की संख्या 108 है।

B. चारों वेदों का विस्तृत वर्णन

1. ऋग्वेद (सबसे प्राचीनतम वेद)

  • विषयवस्तु: देवताओं की स्तुति एवं प्रार्थना (पद्यात्मक रूप में)। यह दुनिया का प्रथम ग्रंथ/धर्मग्रंथ है जिसकी रचना सप्तसैंधव प्रदेश में हुई।
  • संकलनकर्ता: महर्षि वेदव्यास। इसके पुजारी (पाठकर्ता) को होता (होतृ) कहा जाता है।
  • इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा और सौर चिकित्सा का वर्णन मिलता है। उपवेद: आयुर्वेद
  • संरचना: 10 मंडल, 1028 सूक्त और 10462 ऋचाएं हैं। (इंद्र के लिए 250 और अग्नि के लिए 200 ऋचाएं)।
  • पहला और दसवां मंडल सबसे नया है, जबकि 2 से 7वां मंडल सबसे प्राचीन है। इसकी कुल 21 शाखाएं हैं, जिनमें प्रमुख 5 हैं: शाकल, वाष्कल, अश्वलायन, शांखायन, और माण्डूकायन।
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ऋग्वेद के प्रमुख मंडल वर्णन / विशेषता
तीसरा (3rd) मंडल सूर्य एवं सवित्री को समर्पित। इसी में गायत्री मंत्र है (रचयिता: विश्वामित्र)।
चौथा (4th) मंडल कृषि (Agriculture) का वर्णन।
सातवां (7th) मंडल दशराज्ञ युद्ध का वर्णन। (रावी नदी के किनारे सुदास vs दस राजा, सुदास विजयी)।
आठवां (8th) मंडल हस्तलिखित ऋचाओं को ‘खील’ कहा गया है।
नौवां (9th) मंडल देवता सोम का वर्णन।
दसवां (10th) मंडल वर्ण व्यवस्था का वर्णन (पुरुषसूक्त)। ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य, और पैर से शूद्र की उत्पत्ति। राजा द्वारा जनता की रक्षा का वर्णन।

ऋग्वेद में शब्दों का उल्लेख: पिता (335 बार), देवता (33 बार), नदियां (25 बार), कृषि (24 बार)। सबसे पवित्र नदी सरस्वती और सबसे ज्यादा बार उल्लेखित नदी सिंधु है। (गंगा का 1 बार और यमुना का 3 बार उल्लेख)।


2. यजुर्वेद (गद्य एवं पद्य दोनों में)

  • विषयवस्तु: कर्मकांड, बलिदान और अनुष्ठान। इसमें 40 अध्याय और 1990 मंत्र हैं।
  • इसके पुजारी को अध्वर्यु कहा जाता है।
  • यजुर्वेद के 2 भाग हैं:
    I. शुक्ल यजुर्वेद: पद्यात्मक, उत्तर भारत में प्रचलित। अन्य नाम- वाजसनेयी संहिता। (शाखाएं: कण्व, मध्यान्दिंन)
    II. कृष्ण यजुर्वेद: गद्यात्मक, दक्षिण भारत में प्रचलित। (शाखाएं: काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय)

3. सामवेद (भारतीय संगीत का जनक)

  • स्वरों के 7 स्वर (सा, रे, गा…) का पहला वर्णन इसी में है। इसके पुजारी को उद्गाता कहा जाता है।
  • कुल 1875 मंत्र हैं (केवल 75 नए हैं, बाकी ऋग्वेद से लिए गए हैं)।
  • यह उपासना का प्रवर्तक है। इसके 3 शाखाएं हैं: कौथुमीय, राणायनीय, और जैमिनीय।

4. अथर्ववेद (सबसे बाद का वेद)

  • रचना: अथर्वा ऋषि द्वारा। यह अंधविश्वासों, जादू-टोना पर आधारित वेद है।
  • अन्य नाम: महीवेद, ब्रह्मवेद, भैषज्यवेद, अथर्वांगिरस वेद।
  • संरचना: 20 कांड, 731 सूक्त, 5987 मंत्र। शाखाएं: शौनक और पिप्पलाद।
  • इसी वेद में सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है। अंग, मगध, और अयोध्या महाजनपद का वर्णन इसी में मिलता है।
  • नोट: अथर्ववेद का कोई भी ‘आरण्यक ग्रंथ’ नहीं है।

C. वेदों के ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद ग्रंथ

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वेद ब्राह्मण ग्रंथ आरण्यक ग्रंथ प्रमुख उपनिषद
ऋग्वेद ऐतरेय, कौषीतकी ऐतरेय, शांखायन ऐतरेय, आत्मबोध, कौषीतकी, मुदगल, निर्वाण
यजुर्वेद शतपथ ब्राह्मण वृहदारण्यक वृहदारण्यक, ईशो, तैत्तिरीय, कठो, श्वेताश्वतर, मैत्रायणी
सामवेद पंचविश, षडविश, जैमिनीय, तांड्य तलवाकार छांदोग्य, केनो
अथर्ववेद गोपथ (नोट्स के अनुसार कोई आरण्यक नहीं) (कोई नहीं) मुंडको, माण्डूक्य, प्रश्नो

💡 उपनिषदों व ब्राह्मण ग्रंथों के VVI तथ्य (परीक्षा विशेष)

  • शतपथ ब्राह्मण: सबसे बड़ा व प्राचीन। इसमें विदेघ माधव की कथा है। स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी और लक्ष्मी का अवतार कहा गया है।
  • वृहदारण्यक उपनिषद: गार्गी एवं याज्ञवल्क्य संवाद।
  • तैत्तिरीय उपनिषद: ‘सदा सत्य बोलो’, ‘अतिथि देवो भव:’।
  • कठो उपनिषद: यम-नचिकेता संवाद, ‘ओम् (ॐ)’ शब्द का महत्व।
  • छांदोग्य उपनिषद: सबसे प्राचीन। देवकी पुत्र कृष्ण का उल्लेख, 3 आश्रमों का वर्णन, भक्त आरुणि-श्वेतकेतु संवाद।
  • मुंडको उपनिषद: ‘सत्यमेव जयते’ का वर्णन।
  • श्वेताश्वतर उपनिषद: योग का वर्णन। मैत्रायणी: त्रिमूर्ति का वर्णन। ईशो: कर्मवाद का वर्णन।

नोट: कुल 108 उपनिषदों में से 4 गद्य रूप में (कठ, ईश, श्वेताश्वतर, मैत्रायणी), 2 गद्य-पद्य दोनों में (प्रश्नो, केनो), और बाकी पद्य में हैं।

D. ऋग्वैदिक काल का भौगोलिक विस्तार व नदियां

  • विस्तार: उत्तर (तुर्कमेनिस्तान), पश्चिम (अफगानिस्तान), पूर्व (हिमालय), दक्षिण (अरावली पर्वत)। भारत में यह पंजाब, J&K, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी UP और उत्तरी राजस्थान तक फैला था।
  • सप्तसैंधव प्रदेश: जहाँ 7 नदियां एक साथ बहती थीं (सिंधु, झेलम, चेनाब, व्यास, रावी, सतलज, सरस्वती)। यहाँ देवासुर संग्राम हुआ, इसे ‘देवकृत योनि’ भी कहते हैं।
  • पश्चिमी हिमालय को हिमवंत और समुद्र को परावत कहा गया। प्रमुख चोटियां: मुजवंत, सिलामंत, आर्जिक, सायनाव्रत, सुसोमा।
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नदी का नाम ऋग्वेद में दिए गए उपनाम
सिंधु नदी हिरण्यनी, ऊर्णावती, सुशोमा
सरस्वती नदी नदीतमा, देवितमा, मातेतमा, नदियों की माता, अग्रवती, वाणी, बुद्धि, संगीत की देवी

E. ऋग्वैदिक कालीन समाज, महिलाएं एवं प्रशासन

समाज एवं विवाह

  • वर्ण व्यवस्था: यह जन्म पर आधारित न होकर कर्म (काम) पर आधारित थी।
  • समाज: पितृसत्तात्मक था। परिवार के मुखिया को कुलप कहा जाता था।
  • प्रथाएं: बाल विवाह, बहु-विवाह, दहेज प्रथा, और पर्दा प्रथा नहीं थी।
  • विधवा विवाह (नियोग प्रथा- छोटे देवर से शादी) और अंतर्जातीय विवाह लागू था (अनुलोम- उच्च वर्ण का पुरुष+निम्न वर्ण की लड़की; प्रतिलोम- उच्च वर्ग की लड़की+निम्न वर्ग का पुरुष)।
  • जीवन भर कुंवारी रहने वाली लड़की को अमाजू कहा जाता था। महिलाओं को शिक्षा और यज्ञ में भाग लेने का अधिकार था।
  • प्रमुख विदुषी (शिक्षित) महिलाएं: कात्यायनी, सिकता, अपाला, लोपामुद्रा, विश्ववारा, गार्गी।

जीवन शैली

  • भोजन व वस्त्र: लोग शाकाहारी व मांसाहारी दोनों थे। सूती और ऊनी वस्त्र पहनते थे, आभूषणों का भी प्रचलन था।
  • शव संस्कार: इस काल में मृतकों को जलाया जाता था।
  • बीमारी: TB रोग का प्रमाण मिला है। डॉक्टर/वैद्य के लिए भिषज शब्द का प्रयोग हुआ।
  • पशु: गाय, घोड़ा, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, हाथी, ऊंट, कुत्ता, सूअर।
  • धर्म: मंदिर एवं मूर्ति पूजा का कोई उल्लेख नहीं मिलता।

प्रशासनिक व्यवस्था (Administration)

  • ग्राम के प्रमुख को ग्रामिणी कहा जाता था। चरागाह के अधिकारी को व्राजपति कहते थे।
  • राजा (King): प्रशासन राजतंत्रात्मक था, राजा का पद वंशानुगत होता था। राजा की तुलना ‘इंद्र’ और ‘वरुण’ से की गई।
  • जनपद शब्द का उल्लेख एक बार भी नहीं हुआ है। युद्ध धनुष-बाण से लड़े जाते थे।
  • राजा की सहायता के लिए: सेनानी, पुरोहित और ग्रामिणी होते थे। सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी पुरोहित था (कार्य: सही-गलत का अवगत कराना)। पुरोहित दक्षिणा में ‘गाय’ लेता था।
  • कर (Tax): राजा जनता से स्वेच्छा से ‘बलि’ नामक कर (Tax) लेता था।
  • न्याय: न्यायाधीश का उल्लेख नहीं है; राजा ही न्याय करने का काम करता था।