9. सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन (छठी शताब्दी ई.पू.)

छठी शताब्दी ई.पू. में भारत में एक बड़े सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन का उदय हुआ। इसके पीछे मुख्य रूप से सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कारण जिम्मेदार थे।

A. सुधार आंदोलन के प्रमुख कारण

1. सामाजिक कारण

  • वर्ण व्यवस्था उत्तर वैदिक काल से जटिल बन गई थी।
  • वर्ण का आधार ‘कर्म’ पर न होकर ‘जन्म’ पर आधारित हो गया था।
  • ब्राह्मण एवं क्षत्रिय समाज में सुविधा भोगी वर्ग बन गए थे।
  • वैश्य एवं शूद्र को निम्न स्तर का दर्जा दिया गया।
  • शूद्रों की स्थिति सबसे खराब थी, उन्हें हमेशा ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य की सेवा करने तक सीमित कर दिया गया था।

2. आर्थिक कारण

  • आर्यों का मुख्य पेशा कृषि था।
  • छठी शताब्दी आते-आते लोगों ने कृषि क्षेत्र में लोहे का प्रयोग बड़े पैमाने पर शुरू किया।
  • लोहे से रथ और हल बनाये गए, जिससे खेती की गहरी जुताई संभव हुई और उत्पादन सर्वाधिक हुआ।
  • काठक संहिता में 24 बैलों के द्वारा जुताई का प्रमाण मिलता है।
  • बड़े पैमाने पर ‘बलि प्रथा’ के कारण पशुओं का विनाश होने लगा, जिसे रोकने के लिए लोगों ने सोचा (क्योंकि कृषि के लिए पशु अनिवार्य थे)।
  • उपनिषद में भी बलि प्रथा को बेकार बताया गया है।

3. धार्मिक कारण

  • छठी शताब्दी में पुरोहित वर्ग स्वार्थी बन गया था।
  • पुरोहित आडंबर, अंधविश्वास और कर्मकांड को बढ़ावा दे रहे थे और समाज में इन्ही के माध्यम से सबसे ज्यादा रुपया कमा रहे थे।
  • यह पुरोहित लोगों को नैतिकता का ज्ञान देते थे लेकिन स्वयं भोग-विलास में रहते थे।
  • इन्हीं कारणों से लोगों ने नया धर्म चुनने का फैसला लिया।

B. धार्मिक आंदोलन का स्वरूप एवं परिणाम

  • इस आंदोलन का स्वरूप सुधारवादी था।
  • इस समय लोगों ने पुराने धर्म में फैली कुरीतियों, कर्मकांडों, आडंबर और अंधविश्वास को चुनौती देना प्रारंभ कर दिया।
  • इसी तरह का कार्य यूरोप में मार्टिन लूथर एवं काल्विन जैसे सुधारकों ने किया था।
  • यह आंदोलन केवल धर्म से संबंधित नहीं था, बल्कि यह आर्थिक गतिविधि के प्रोत्साहन से भी जुड़ा था।
  • परिणाम: इस आंदोलन के परिणामस्वरूप पुराने धर्मों का लोप हुआ, नए धर्मों (जैन एवं बौद्ध) का उदय हुआ, और वैदिक धर्म में भी सुधार हुआ।

C. प्रमुख सम्प्रदाय एवं उनके प्रवर्तक

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सम्प्रदाय का नाम प्रवर्तक (संस्थापक)
उच्छेदवाद सम्प्रदायअजीत केसम्वलीन
आजीवक सम्प्रदायमख्खलीपुत गोसाल
घोर अक्रियावादपूरण कश्यप
अनिश्चय वादसंजय वेलठपुत्र
लोकायत सम्प्रदायचार्वाक
नित्यवादपकुधकुच्चायन

D. प्रमुख प्रवर्तकों का विस्तृत विवरण

1. अजीत केसम्वलीन

  • इनका मत था कि पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु से ही शरीर का निर्माण हुआ है।
  • मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता है।
  • इनके अनुसार पाप-पुण्य और सत्य-असत्य की कल्पना झूठी है।

2. मख्खलीपुत गोसाल (आजीवक सम्प्रदाय)

  • इन्होने भारत में आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना की।
  • प्रारंभ में ये महावीर स्वामी के शिष्य हुआ करते थे। 6 वर्ष महावीर के साथ गुजारने के पश्चात् इन दोनों में विवाद हो गया एवं ये लोग अलग हो गए।
  • इनका मानना था कि मनुष्य नियति के अधीन है; ब्रह्मा ने जो लिख दिया है वही अटल है।
  • नियति के अनुसार ही मनुष्य के जीवन में सुख एवं दुःख आएगा।
  • आजीवक सम्प्रदाय के लोग नंगे रहते थे और कठोर तपस्या में भरोसा रखते थे।
  • इस सम्प्रदाय का उल्लेख अशोक के अभिलेखों में मिलता है।
  • मौर्य शासक बिन्दुसार ने आजीवक सम्प्रदाय को संरक्षण दिया था।
  • सम्राट अशोक एवं उनके पौत्र दशरथ ने आजीवकों के रहने के लिए गुफाएं बनवाई थीं।

3. पूरण कश्यप

  • इनका मानना था कि मनुष्य के अच्छे एवं बुरे कर्मों का कोई फल नहीं मिलता है।
  • यह कर्म एवं पुनर्जन्म में भरोसा नहीं करते थे।
  • बुद्ध की मृत्यु के 16वें वर्ष इन्होने श्रावस्ती में जल समाधि ले ली थी।
  • आगे चलकर इनका सम्प्रदाय आजीवक सम्प्रदाय में विलीन हो गया।