6. उत्तरवैदिक काल (1000 ई.पू. – 600 ई.पू.)

उत्तरवैदिक काल: इस काल में आर्यों का विस्तार गंगा-यमुना दोआब तक हो गया था। इस काल में लोहे का प्रयोग प्रारम्भ हो गया, जिससे कृषि और अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव आए। इस काल में वस्तु विनिमय (Barter System) का प्रचलन था।

A. समाज, उपनयन संस्कार और महिलाओं की स्थिति

  • गोत्र प्रथा: गोत्र प्रथा का सबसे पहला वर्णन उत्तरवैदिक काल में ही मिलता है।
  • उच्चारण की शुद्धता पर बहुत जोर डाला गया और प्रत्येक व्यक्ति को यज्ञ करना जरुरी था।
  • प्रथाएं: बाल विवाह प्रथा का प्रचलन था। सिर्फ उच्च वर्ण की लड़कियाँ अपनी स्वेच्छा से विवाह कर सकती थीं (Love Marriage)।
  • सती प्रथा, पर्दा प्रथा और तलाक प्रथा का कोई प्रमाण इस काल में नहीं मिलता है।

उपनयन संस्कार (जनेऊ) का वर्णन

इस काल में केवल तीन वर्णों के उपनयन संस्कार की जानकारी मिलती है:

  • ब्राह्मण: 8 वर्ष की उम्र में (वसंत ऋतु में)
  • क्षत्रिय: 11 वर्ष की उम्र में (ग्रीष्म ऋतु में)
  • वैश्य: 12 वर्ष की उम्र में (शरद ऋतु में)

महिलाओं की स्थिति (गिरावट)

  • इस काल में महिलाओं की स्थिति को नीचा दिखाया गया।
  • ऐतरेय ब्राह्मण: इसमें कहा गया है कि “समस्त दुखों का कारण धरती पर महिला है” और “सभी दुखों का निवारण पुरुष है।”
  • मैत्रायणी संहिता: इसमें स्त्री को ‘जुआ एवं शराब की भाँति’ मनुष्य का मुख्य तीसरा दोष बताया गया है।
  • अथर्ववेद का उल्लेख: एक विधवा स्त्री ने 10 शादियाँ की थीं। वहीं राजा हरिश्चन्द्र ने 100 शादियाँ की थीं।
  • प्रमुख विदुषी/शिक्षित स्त्रियाँ: गार्गी, मैत्रेयी, सुभला, देववती, कात्यायनी, काश कृत्स्नी।

B. उत्तरवैदिक काल में 8 प्रकार के विवाह

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विवाह का प्रकार वर्णन / विशेषता
1. ब्रह्म विवाहकन्या के माता-पिता द्वारा लड़का खोजकर किया गया विवाह।
2. दैव विवाहयज्ञ करने वाले पुरोहित के साथ कन्या का विवाह कर देना।
3. आर्ष विवाहकन्या के पिता द्वारा गाय के बदले अपनी पुत्री का विवाह करना।
4. प्रजापत्य विवाहलड़का स्वयं लड़की के पिता से उसका हाथ मांगकर विवाह करता था।
5. असुर विवाहलड़की का पिता पैसा लेकर लड़की को बेच देता था।
6. गन्धर्व विवाहप्रेम प्रसंग (Love) द्वारा किया गया विवाह।
7. पैशाच विवाहपागल लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाकर उसे छोड़ देना।
8. राक्षस विवाहकिसी भी लड़की का अपहरण करके उससे जबरदस्ती विवाह करना।

C. अर्थव्यवस्था, कृषि एवं पशुपालन

  • मुख्य भोजन: मछली, रोटी, चावल, नमक।
  • पशुपालन/जानवर: इस काल के लोगों को 2 नए जानवरों की जानकारी थी— बाघ एवं हाथी
  • अर्थव्यवस्था: अर्थव्यवस्था का प्रमुख साधन कृषि था। वर्ष में 2 बार फसल आने का वर्णन मिलता है।
  • सिंचाई के साधन: वर्षा जल का प्रयोग, नदी, कुआँ, तालाब, और नहर के जल का प्रयोग।
  • अथर्ववेद में पहली बार नहर का वर्णन मिलता है। नहर को ‘कुल्या’ कहा गया है।
  • पुरातात्विक साक्ष्य: एटा जिला (UP) से गेहूँ, जौ, चावल का प्रमाण मिला। हस्तिनापुर (UP) से चावल एवं गन्ना का प्रमाण मिला।
  • सुनसीर: हल चलाने वाले का वर्णन इस शब्द से किया गया है।

D. उत्तरवैदिक काल के प्रमुख शब्द (VVI Terminology)

1. कृषि (किसान) से सम्बंधित 4 प्रमुख शब्द

  • जुताई: वपंत
  • कटाई: लुनंत
  • बुआई: कृषंत
  • मड़ाई: मृणन्त

2. फसलों के प्राचीन नाम

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फसल उत्तरवैदिक नाम फसल उत्तरवैदिक नाम
गेहूँगोधूमजौयव
धानशालीगन्नाइक्षु
सरसोंसरिस्काउड़दमासक (माष)

3. व्यवसाय एवं धातुओं के नाम

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प्राचीन शब्द अर्थ / पेशा धातु का नाम प्राचीन शब्द (प्रयोग)
कटरिकरबुनाई करने वालासोना (Gold)हिरण्य
बिदलकारटोकरी बनाने वालाकाँसा (Bronze)त्रपु
कुलालकुंभकार (बर्तन बनाने वाला)ताम्बा (Copper)लोहित अयस
रजयत्रीरंगाई करने वालालोहा (Iron)श्याम अयस
रज्जु सर्परस्सी बनाने वाला
तक्षणबढ़ई (Carpenter)
चर्मनारजानवरों की खाल खींचने वाला