असहयोग आंदोलन तथा गांधी-दास समझौता
औपचारिक शुरुआत: 1 अगस्त 1920।
विशेष: यह महात्मा गांधी का प्रथम राष्ट्रीय आंदोलन था।
स्थगित: 12 फरवरी 1922 (चौरी-चौरा घटना के कारण)।
A. पृष्ठभूमि और आंदोलन की शुरुआत
- मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919): इसके तहत प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली और विधान परिषद् का चुनाव प्रस्तावित था।
- 1920 में खिलाफत समिति की बैठक में असहयोग आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया गया।
- 1 अगस्त 1920: आंदोलन की शुरुआत हुई, परंतु दुर्भाग्यवश इसी दिन बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हो गई।
- उपाधियों की वापसी: आंदोलन के समर्थन में महात्मा गांधी ने ‘कैसर-ए-हिन्द’ और जमनालाल बजाज ने ‘राय बहादुर’ की उपाधि लौटा दी।
कांग्रेस के प्रमुख अधिवेशन एवं प्रस्ताव
- बिहार प्रांतीय कांग्रेस का 12वां अधिवेशन: भागलपुर में हुआ (अध्यक्ष: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद)। यहीं पहली बार असहयोग आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव पारित हुआ था।
- कलकत्ता विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920): इसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की। इसमें महात्मा गांधी ने स्वयं असहयोग का प्रस्ताव पेश किया था।
⚠️ असहयोग प्रस्ताव का विरोध करने वाले प्रमुख नेता
- मोहम्मद अली जिन्ना (Resigned)
- मदन मोहन मालवीय
- नारायण चंदावरकर
- विपिन चन्द्र पाल (Resigned)
- चितरंजन दास
- एनी बेसेंट (Resigned)
- सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
- जी. एस. खापर्डे (Resigned)
- शंकरन नायर
B. 1920 का नागपुर अधिवेशन और आंदोलन का प्रभाव
- नागपुर अधिवेशन (1920): इसके अध्यक्ष ‘वीर राघवाचारी’ थे। इसमें चितरंजन दास ने असहयोग का प्रस्ताव पेश किया जो पारित हो गया।
- महात्मा गांधी ने “1 वर्ष के भीतर स्वराज” प्राप्त करने का वादा किया।
- यह आंदोलन उत्तर भारत, पश्चिम भारत एवं बंगाल में सबसे ज्यादा प्रभावी और सफल रहा।
- बंगाल नेशनल कॉलेज: इसके प्रिंसिपल सुभाष चन्द्र बोस थे।
- बिहार में नेतृत्व: किसानों का नेतृत्व स्वामी विद्यानंद ने किया।
विदेशी कपड़ों की होली और तिलक से जुड़े तथ्य
- विदेशी कपड़ों की होली जलाने को रविन्द्र नाथ टैगोर ने “निष्ठुर बर्बादी” कहा था।
- जबकि महात्मा गांधी ने कहा था कि “विदेशी कपड़ों की बर्बादी ही उनके साथ सर्वोत्तम व्यवहार होगा”।
- बाल गंगाधर तिलक की अर्थी को गांधी जी के साथ एक मुसलमान “शौकत अली” ने कंधा दिया था।
- तिलक की मृत्यु पर गांधी जी ने कहा: “मेरा सबसे मजबूत बचाव चला गया”।
C. चौरी-चौरा कांड और आंदोलन की समाप्ति
- घटना: चौरी-चौरा में भगवान अहीर के नेतृत्व में जुलूस निकला था। इसमें 22 पुलिसकर्मी जिन्दा जल गए।
- सूचना: चौरी-चौरा घटना की सूचना दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने गांधी जी को दी (तब गांधी जी बारदोली में थे)।
- मुकदमा: सरकार ने मुकदमा किया और 170 लोगों को फाँसी की सजा सुनाई। इनमें से 151 लोगों की फाँसी मदन मोहन मालवीय ने माफ करवाई।
- गांधी जी की गिरफ़्तारी: मार्च 1922 में महात्मा गांधी गिरफ्तार हुए और न्यायधीश ब्रूमफील्ड ने उन्हें 6 वर्ष कैद की सजा सुनाई।
D. स्वराज पार्टी का गठन (1 जनवरी 1923)
- पृष्ठभूमि (गया अधिवेशन): इसके अध्यक्ष चितरंजन दास थे। मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के तहत विधान परिषद् का चुनाव लड़ने को लेकर मतभेद हुआ।
- मतभेद के कारण चितरंजन दास ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और 1 जनवरी 1923 को स्वराज पार्टी का गठन किया।
- अध्यक्ष: चितरंजन दास। सचिव: मोतीलाल नेहरू।
- स्वराज पार्टी का पुराना नाम ‘कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी’ था।
- बिहार में: स्वराज दल का नेतृत्व श्री कृष्ण सिंह ने किया।
- सविनय अवज्ञा जाँच समिति: इसके अध्यक्ष हकीम अजमल खाँ थे।
स्वराज पार्टी का चुनावी प्रदर्शन
- नवम्बर 1923 (केन्द्रीय विधान परिषद् चुनाव): स्वराज पार्टी ने 101 में से 42 सीटें जीतीं। बिहार में 12 में से 8 सीटें जीतीं।
- प्रांतों में प्रदर्शन: मध्य प्रांत (स्पष्ट बहुमत), बंगाल प्रांत (सबसे बड़ा दल), यूपी व असम (दूसरी बड़ी पार्टी), मद्रास व पंजाब (कमजोर प्रदर्शन)।
- प्रथम भारतीय अध्यक्ष: 1925 में विट्ठल भाई पटेल (सरदार पटेल के बड़े भाई) केन्द्रीय विधान मंडल के अध्यक्ष बने।
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| 1924 का नगरपालिका चुनाव और प्रमुख नेता | |
|---|---|
| पटना | डॉ. राजेन्द्र प्रसाद |
| इलाहाबाद | जवाहर लाल नेहरू |
| कलकत्ता | चितरंजन दास |
| अहमदाबाद | विट्ठल भाई पटेल |
E. गांधी-दास समझौता (नवंबर 1924)
- गांधी जी की रिहाई: 1922 में गांधी जी को 6 वर्ष की सजा हुई थी (1922 से 1928 तक)। लेकिन जेल में सेहत खराब होने के कारण उन्हें फरवरी 1924 में ही जेल से रिहा कर दिया गया।
- गांधी का रुख: शुरुआत में गांधी जी स्वराजी नेताओं के विरोधी थे, लेकिन बाद में उन्होंने माना कि स्वराजी नेता निष्ठावान, ईमानदार, सुयोग्य, अनुभवी और देशभक्त हैं।
- नवंबर 1924 में संयुक्त बैठक: गांधी जी, सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू के बीच एक संयुक्त बैठक हुई जिसे गांधी-दास समझौता कहा गया।
समझौते के प्रमुख बिंदु:
- स्वराज पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया गया।
- स्वराज पार्टी के उम्मीदवार सदन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करेंगे।
- महात्मा गांधी के द्वारा खादी आंदोलन चलाया जाएगा।
निष्कर्ष: 1926 के चुनावों में स्वराज पार्टी को अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली और यह धीरे-धीरे कमजोर पड़ गई।