8. मगध के प्रमुख राजवंश

मगध के प्रमुख राजवंशों का क्रम इस प्रकार है: 1. बृहद्रथ वंश, 2. हर्यंक वंश, 3. शिशुनाग वंश, 4. नंद वंश, और 5. मौर्य वंश

A. बृहद्रथ वंश (सबसे प्राचीन वंश)

  • संस्थापक: राजा बृहद्रथ (यह मगध साम्राज्य का सबसे प्राचीन वंश था)।
  • बृहद्रथ के पिता का नाम उपरीचर, माता का नाम गिरिका, और लड़के का नाम जरासंध था।
  • बृहद्रथ के नाम का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
  • मगध की सीमाएं: उत्तर में गंगा नदी, पश्चिम में सोन नदी, पूर्व में चंपा नदी, और दक्षिण में विन्ध्याचल पहाड़ी तक विस्तृत थीं।

जरासंध (बृहद्रथ का पुत्र)

  • जरासंध नाम का वर्णन पुराणों में मिलता है।
  • यह यादवों का शत्रु था; महाभारत में इसे ‘खलनायक’ कहा गया है, जबकि पुराणों में इसे ‘महाबली’ और ‘महाबाहु’ भी कहा गया है।
  • जरासंध की हत्या पांडव पुत्र भीम ने की।

उत्तराधिकारी क्रम: जरासंध की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र सहदेव राजा बना और उसकी मृत्यु के बाद रिपुंजय राजा बना। रिपुंजय की हत्या उसके मंत्री पुलिक ने कर दी और अपने पुत्र भटिय को राजा बनाया। इसी भटिय ने अपने लड़के बिम्बिसार को राजा बनाया。

B. हर्यंक वंश (544 ई.पू. – 412 ई.पू.)

स्थापना बिम्बिसार ने की; इस वंश का अन्य नाम ‘पितृहंता वंश’ भी है。

1. बिम्बिसार (544 – 492 ई.पू.)

  • प्रारंभ में यह बौद्ध धर्म का अनुयायी था, बाद में अपनी पत्नी चेलना के प्रभाव में आकर जैन धर्म अपना लिया।
  • मत्स्य पुराण में इसे ‘क्षेत्रोजस’ तथा जैन साहित्य में ‘श्रेणिक / सेनिया’ कहा गया है।
  • इसने राजगीर को अपनी राजधानी बनाया।
  • इसके 2 सलाहकार थे- सुनिधि एवं दिर्घचारण; और इसके दरबार के उच्च अधिकारी ‘राजभट्ट’ कहलाते थे।
  • प्राचीन इतिहास में स्थायी सेना की नींव सबसे पहले इसी ने रखी और प्रशासनिक व्यवस्था पर जोर डाला। बौद्ध ग्रंथों में इसकी 500 रानियों का वर्णन है।
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बिम्बिसार के 4 प्रमुख अधिकारीकार्य विवरण
1. संबंधक अधिकारीसामान्य कार्यों को देखने वाला।
2. सेनानायक अधिकारीसेना के कार्यों को देखने वाला।
3. वाहरिक अधिकारीन्यायिक कार्य देखने वाला।
4. महामात्र अधिकारीउत्पादन को इकट्ठा करने वाला।

बिम्बिसार की 3 नीतियां: 1. वैवाहिक नीति, 2. मित्रवत नीति, 3. युद्ध एवं आक्रामक नीति।

बिम्बिसार के 4 प्रमुख विवाह एवं संताने

  • महाकोशला देवी: कोसल नरेश प्रसेनजीत की बहन (दहेज में कोसल व काशी मिला)। पुत्र- अजातशत्रु
  • चेलना: लिच्छवी राजा चेटक की पुत्री। पुत्र- हल्ल एवं बेहल्ल
  • क्षेमा: पंजाब की राजकुमारी। पुत्र- आस्तिक देव
  • आम्रपाली: वैशाली की गणिका। पुत्र- अभय कुमार

💡 वैद्य जीवक और बिम्बिसार

अभय कुमार को सड़क किनारे ‘जीवक’ नाम का एक लावारिस लड़का मिला (जो शलावती नामक वेश्या का पुत्र था)। बिम्बिसार ने अपने खर्चे से जीवक को तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढ़ाई हेतु भेजा। यही जीवक बड़ा वैद्य बनकर वापस आया। बिम्बिसार ने जीवक को अवंति के राजा का पीलिया रोग ठीक करने और महात्मा बुद्ध के इलाज के लिए भी भेजा था।

  • बिम्बिसार के हाथी का नाम ‘श्यनक’ था (यह हाथी 16 लड़ियों वाला कुंडल हार पहनता था)। इसने राजगीर में राजगृह किला बनवाया और बुद्ध को ‘वेणुवन विहार’ दान में दिया।
  • हत्या का कारण: पत्नी चेलना के दो लड़के (हल्ल एवं बेहल्ल) अपने ननिहाल लिच्छवी जा रहे थे। बिम्बिसार ने इन दोनों बेटों को श्यनक हाथी पर बैठाया और 16 लड़ी वाला हार हल्ल के गले में डाल दिया। इसी कारण से 492 ई.पू. में अजातशत्रु ने अपने माता-पिता की हत्या कर दी।

2. अजातशत्रु (492 – 461 ई.पू.)

  • इसका बचपन का नाम ‘कुणिक’ था और यह बौद्ध धर्म का अनुयायी था।
  • इसने अपने मामा प्रसेनजीत की लड़की ‘वाजीरा’ से विवाह किया।
  • राजा बनते ही अंग, लिच्छवी, वज्जि, कोसल और काशी महाजनपद को जीतकर मगध में मिलाया। इसका सलाहकार ‘वर्षकार’ था।
  • अवंति नरेश पालक के डर से इसने मगध में चारदिवारी बनवाई और इस चारदिवारी के उद्घाटन के लिए महात्मा बुद्ध को बुलाया।
  • बुद्ध की सलाह पर इसने अपने सलाहकार वर्षकार को वज्जि में फूट डालने के लिए भेजा।
  • वज्जि को जीतने के लिए इसने 2 नए प्रक्षेपास्त्र हथियार उपयोग किये: 1. रथमुसल (बड़े पत्थर/गोला फेंकने वाला) और 2. महाशिलाकंटक (दिवार/किला तोड़ने के काम आने वाला)। 16 वर्ष संघर्ष के बाद इसे विजय प्राप्त हुई।
  • इसके शासनकाल में ही प्रथम बौद्ध संगीति (483 ई.पू. में) राजगीर के सप्तपर्णी गुफा में हुई।
  • इसने बुद्ध की मृत्यु के पश्चात उनकी अस्थि प्राप्त की और राजगीर पहाड़ी पर स्तूप बनवाया।
  • अजातशत्रु की हत्या इसके पुत्र उदयिन ने कर डाली।

3. उदयिन या उदयभद्र (461 – 444 ई.पू.)

  • यह बौद्ध धर्म का अनुयायी था। जैन ग्रंथों (परिशिष्टपर्वन एवं त्रिषष्ठीशलाका पुरुष चरित) के अनुसार उदयिन ‘चंपा’ का राज्यपाल था।
  • परिशिष्टपर्वन, गार्गी संहिता और वायुपुराण के अनुसार इसने गंगा, सोन एवं गंडक के संगम पर पाटलीपुत्र (पाटलीग्राम) शहर की स्थापना की और इसे अपनी पहली राजधानी बनाया।
  • पाटलीपुत्र से 8 km दूरी पर इसने ‘कुसुमपुर’ शहर की स्थापना की।
  • उदयिन के 3 पुत्र थे: अनिरुद्ध, मुण्डक और नागदशक।
  • नागदशक: इसने अपने दोनों भाइयों और पिता उदयिन की हत्या कर दी (437-412 ई.पू.)। यह हर्यंक वंश का अंतिम राजा था। इसके मंत्री शिशुनाग ने इसे पद से मारा, अपदस्थ किया और मगध में नए वंश की स्थापना की।

C. शिशुनाग वंश (412 – 344 ई.पू.)

इस वंश की राजकीय भाषा संस्कृत/प्राकृत थी और इस वंश के राजा क्षत्रिय थे。

1. शिशुनाग (412 – 394 ई.पू.)

  • प्रारंभ में जैन धर्म का अनुयायी था, बाद में बौद्ध धर्म का अनुयायी बना। इसका एक अन्य नाम ‘नंदिवर्धन’ था।
  • इसने अपनी राजधानी वैशाली को बनाया।
  • शिशुनाग ने अवंति नरेश अवंतिवर्धन को पराजित किया। अवंति एवं वत्स को जीतकर मगध साम्राज्य में मिलाना इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
  • इसने अपने साम्राज्य की सीमा बंगाल से लेकर मालवा तक फैलाई। निधन के पश्चात इसका पुत्र ‘कालाशोक’ राजा बना।

2. कालाशोक (394 – 366 ई.पू.)

  • बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान एवं महावंश में इन्हें कालाशोक कहा गया है; जबकि पुराणों में इनका नाम ‘काकवर्ण’ मिलता है
  • राजा बनते ही इसने राजधानी वैशाली से हटाकर पुनः पाटलीपुत्र कर दी।
  • इनके समय में ही दुसरा बौद्ध संगीति का आयोजन (383 ई.पू. में) हुआ, जिसमें बौद्ध धर्म का 2 भागों में विभाजन (स्थावीर एवं महासांघिक) हो गया।
  • महावंश के अनुसार कालाशोक के 10 पुत्र थे (भद्रसेन, कोरंडवर्ण, मुंगोर, सर्वज, जलिक, उभाक, संजय, कोरव्य, नंदिवर्धन, पंचमाक)।
  • शिशुनाग वंश का अंतिम राजा ‘नंदिवर्धन’ था (इसकी हत्या इसके मंत्री महापद्मनंद ने कर डाली और मगध में नंद वंश की स्थापना की)।

D. नंद वंश (344 – 323 ई.पू.)

1. महापद्मनंद (344 – 336 ई.पू.)

  • संस्थापक: महापद्मनंद (वास्तविक नाम- उग्रसेन)।
  • प्रमुख उपाधियां: एकराट, सर्वक्षत्रोजसनाशक (सर्वक्षत्रांतक), एकछत्र पृथ्वी का राजा, अपरोपरशुराम।
  • इन्होने कलिंग (उड़िसा) पर हमला किया और वहाँ से जैन प्रतिमा (जिनसेन की मूर्ति) लेकर भाग आये।
  • कलिंग में ही इन्होने ‘नतसुली’ नामक नहर बनवाया (इन दोनों बातों की जानकारी हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलती है)।
  • महापद्मनंद को ‘केन्द्रीय शासन पद्धति का जनक’ और ‘प्रथम ऐतिहासिक सम्राट’ का दर्जा दिया जाता है। इन्होने अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर भारत में किया।
  • इनके शासनकाल में 3 प्रमुख विद्वान (वर्ष, उपवर्ष, कात्यायन) का उदय हुआ। महर्षि पाणिनी इनके परम मित्र थे।
  • इनके कुल 8 पुत्र थे; जिनमें से ‘धनानंद’ नंद वंश का अंतिम राजा बना।

2. धनानंद (336 – 323 ई.पू.)

  • अत्यधिक धन-संपत्ति होने के कारण यूनानी भाषा में इसे ‘अग्रमीज’ कहा गया। कथासरित्सागर ग्रंथ के अनुसार इसके पास 990 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ थीं।
  • विशाखदत्त की पुस्तक ‘मुद्राराक्षस’ में धनानंद को दमनकारी एवं अत्याचारी कहा गया है।
  • मुद्राराक्षस ग्रंथ (VVI): विशाखदत्त ने इसे गुप्त काल में लिखा। इस किताब में नंद राजाओं को ‘क्षत्रिय’ बताया गया है। इसे भारतीय इतिहास का प्रथम जासूसी ग्रंथ माना जाता है और यह ‘नायिका विहीन’ नाटक था।
  • शक्तिशाली सेना: मगध में सबसे शक्तिशाली सेना धनानंद के पास थी (2 लाख पैदल सैनिक, 20 हजार घुड़सवार, 2 हजार रथ, और 4 हजार हाथी सेना)।
  • धनानंद सिकन्दर के समकालीन था।

E. सिकन्दर का आक्रमण (Alexander’s Invasion)

  • अलेक्जेंडर सिकंदर युनान से चलकर हिंदुुकुश पर्वत पार करके स्थलमार्ग से 326 ई.पू. में तक्षशिला में प्रवेश किया।
  • तक्षशिला का राजा ‘आम्भी’ था: इसने ढेर सारी संपत्ति सिकंदर को दी और पंजाब के राजा पोरस (जिससे इसकी दुश्मनी थी) के बारे में सिकंदर को बता दिया। आम्भी को भारत का प्रथम देशद्रोही माना जाता है।
  • हाइडेस्पेशीज का युद्ध: सिकंदर ने पंजाब के राजा पोरस पर आक्रमण किया। 326 ई.पू. में पोरस एवं सिकंदर के मध्य झेलम नदी के किनारे यह युद्ध हुआ (इसे ‘झेलम-वितस्ता का युद्ध’ भी कहते हैं)।
  • यहीं पर सिकंदर की सेना ने व्यास नदी पार करने से मना कर दिया।
  • 325 ई.पू. में जलमार्ग के रास्ते सिकंदर वापस युनान लौट गया और 323 ई.पू. में बेबीलोन में सिकंदर की मृत्यु हो गई।