17. गुप्त साम्राज्य (240 ई. – 550 ई.)
A. गुप्त वंश के शासकों की जाति (इतिहासकारों का मत)
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| इतिहासकार | निर्धारित जाति |
|---|---|
| आर.सी. मजूमदार + दशरथ ओझा | क्षत्रिय |
| के.पी. जायसवाल | शूद्र |
| एच.सी. राय चौधरी | ब्राह्मण |
| रोमिला थापर + रामशरण शर्मा | वैश्य |
B. गुप्त वंश की जानकारी के स्रोत
साहित्यिक स्रोत
- कालिदास के महाकाव्य: रघुवंशम् एवं कुमारसंभवम्।
- कालिदास के खण्डकाव्य: ऋतुसंहार एवं मेघदूतम्।
- कालिदास के नाटक: अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम्।
- शूद्रक की रचना: मृच्छकटिकम्।
- पुराण: वायु पुराण एवं भागवत पुराण।
- अन्य ग्रंथ: कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ और बौद्ध ग्रंथ ‘आर्य मंजुश्री मूल कल्प’।
पुरातात्विक स्रोत (प्रमुख अभिलेख)
- भितरी अभिलेख: गाजीपुर
- बिलसाड़ अभिलेख: पीलीभीत (UP)
- गढ़वा अभिलेख: UP
- प्रयाग प्रशस्ति: इलाहाबाद
- एरण अभिलेख: MP
- महरौली लौह स्तंभ: दिल्ली
- उदयगिरी अभिलेख: MP
- जूनागढ़ अभिलेख: गुजरात
- मंदसौर अभिलेख: मालवा
C. गुप्त वंश के प्रारंभिक शासक
1. श्रीगुप्त (240 – 280 ई.)
- इन्होने गुप्त वंश की स्थापना की और ‘महाराज’ की उपाधि ग्रहण की।
- इन्होने पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया।
- चीनी तीर्थ यात्रियों के लिए नालंदा में ‘मृगशिखावन मंदिर’ का निर्माण करवाया।
- इनके तुरंत बाद इनका पुत्र घटोत्कच राजा बना।
2. चन्द्रगुप्त प्रथम (320 – 335 ई.)
- राजा बनते ही इन्होने 320 ई. में ‘गुप्त संवत्’ चलाया (इस बात की जानकारी चन्द्रगुप्त II के मथुरा अभिलेख से मिलती है)।
- इन्हें गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
- इन्होने लिच्छवी राजकुमारी ‘कुमारदेवी’ से विवाह किया।
- गुप्त शासकों में सबसे पहले ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि इन्होने ही धारण की।
- गुप्त राजाओं में सबसे पहले इन्होने स्वर्ण मुद्रा जारी किया (इन्हें ‘विवाह नामक स्वर्ण मुद्रा’ या ‘राजा-रानी नामक स्वर्ण मुद्रा’ कहा गया)।
- कौशाम्बी एवं कोसल को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया।
- चन्द्रगुप्त प्रथम ने राजा बनने के लिए अपने बड़े भाई ‘काच’ की हत्या कर दी थी। इनके पुत्र का नाम समुद्रगुप्त था।
D. समुद्रगुप्त (335 – 375 ई.)
- प्रमुख उपाधियां: परक्रमांक, कविराज, श्री विक्रमक, परमभागवत, अप्रतिरथ, पृथ्वीयाम प्रथमवीर, धर्मप्राचीरबन्धु, धरणीबंध, लिच्छवी दौहित्र, सर्वराजोच्छेता (सभी युद्धों का विजेता), और भारत का नेपोलियन।
- समुद्रगुप्त वीणा वादन का शौकीन था (इसके सिक्कों पर इसे वीणा बजाते हुए दिखाया गया है)।
- इनके दरबार में ‘सुबंधु’ नामक बौद्ध विद्वान रहते थे।
- श्रीलंका के राजा मेघवर्मन के अनुरोध पर गया में ‘संघाराम विहार’ बनवाया।
- इन्होने कुल 6 प्रकार की स्वर्ण मुद्राएं चलाईं: 1. गरुड़, 2. धनुर्धारी, 3. परशु, 4. अश्वमेध, 5. व्याघ्र, 6. वीणावादन।
प्रयाग प्रशस्ति स्तंभलेख (VVI)
- इसमें समुद्रगुप्त के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है (इसे समुद्रगुप्त की आत्मकथा कहते हैं)।
- रचना: हरिषेण (समुद्रगुप्त का दरबारी कवि)।
- भाषा: संस्कृत (कुल 33 पंक्तियाँ हैं)। लिपि: ब्राह्मी। शैली: चम्पू शैली।
- इसे पहली बार पढ़ने का काम ‘कैप्टन ड्रायर’ ने किया था।
- पहले इस अभिलेख को अशोक ने कौशाम्बी में स्थापित किया था। अकबर के कहने पर जहाँगीर ने इसे इलाहाबाद किला में स्थापित करवाया।
- इस अभिलेख में अशोक, अकबर, बीरबल, तिलबल भट्ट, हरिषेण और जहाँगीर का वर्णन है।
- इस अभिलेख में अशोक की पत्नी ‘कारुवाकी’ एवं पुत्र ‘तीवर’ का वर्णन है।
- इस स्तंभलेख में पाटलिपुत्र को ‘पुष्पनगर’ कहा गया है।
E. रामगुप्त एवं चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)
रामगुप्त
- यह समुद्रगुप्त के बड़े पुत्र थे। इनके इतिहास की जानकारी ‘देवीचन्द्रगुप्तम्’ और ‘हर्षचरित’ ग्रंथ में मिलती है।
- इसी के समय भारत पर शकों ने हमला किया। रामगुप्त ने अपनी पत्नी ‘ध्रुवदेवी’ को शकों के हवाले कर दिया।
- इस बात से नाराज होकर इसके छोटे भाई चन्द्रगुप्त II ने रामगुप्त की हत्या कर दी और शकों को पराजित कर ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया।
चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)
- पत्नियां: ध्रुवदेवी (पुत्र- कुमारगुप्त) और कुबेर नागा (पुत्री- प्रभावती गुप्त)।
- प्रमुख उपाधियां: देवराज, देव गुप्त, नरेन्द्र, शकरी, विक्रमादित्य, परमभागवत, सिंह विक्रम, शंहशाह।
- भारत से हमेशा-हमेशा के लिए शकों को मारकर भगाया, और इसी ख़ुशी में चाँदी का सिक्का जारी किया।
- इसने अपनी दूसरी राजधानी उज्जैन को बनाया।
- शकों को पराजित करने की जानकारी ‘उदयगिरी अभिलेख’ से मिलती है।
- इनके शासनकाल को ही गुप्त काल का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है। यह शैव धर्म के अनुयायी थे।
- इनका सेनापति ‘आम्रकार्दव’ और मंत्री ‘शिखर स्वामी’ था।
- इन्होने 5 प्रकार की स्वर्ण मुद्राएं चलाईं: धनुर्धारी, छत्रधारी, सिंह निहिता, अश्वरोही, पर्यंक।
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| चन्द्रगुप्त II के दरबार के नवरत्न | ||
|---|---|---|
| 1. कालिदास | 2. घटकर्पर | 3. आर्यभट्ट |
| 4. शंकु | 5. अमर सिंह | 6. क्षपणक |
| 7. धनवंतरी | 8. वररुचि | 9. वेतालभट्ट |
चीनी यात्री फाह्यान (Fa-Hien)
- इनके शासनकाल के दौरान 399 ई. में चीनी यात्री फाह्यान स्थलमार्ग से भारत आया।
- इसका वास्तविक नाम ‘फुकुओकी’ था। यह बौद्ध धर्म के शिक्षा के उद्देश्य से आया था।
- 412 ई. में ताम्रलिप्ति बंदरगाह (बंगाल) से यह वापस लौट गया।
- इसने पाटलिपुत्र, गया, मथुरा, उज्जैन और तक्षशिला का दौरा किया था।
F. कुमारगुप्त एवं स्कंदगुप्त
कुमारगुप्त (415 – 455 ई.)
- उपाधि: महेन्द्र, महेन्द्रादित्य, परमभागवत, शक्रादित्य।
- इनके शासनकाल में सबसे अधिक अभिलेख (कुल 18) बनवाये गए। गुप्त वंश के सभी राजाओं में सबसे लंबा शासनकाल इनका रहा।
- इन्होने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करवाया था (सिक्कों पर ‘अश्वमेध महेन्द्र’ लिखा गया)।
- 415 ई. में इन्होने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की (इसकी जानकारी बिलसाड़ अभिलेख से मिलती है)।
- गुप्तकाल में सर्वाधिक सिक्के कुमारगुप्त के ही प्राप्त किये गए हैं (सबसे बड़ा ढेर बयाना, राजस्थान से मिला)।
- इनके मंत्री का नाम ‘पृथ्वीसेन’ था।
कुमारगुप्त के प्रमुख अभिलेख
- बिलसाड़ अभिलेख: एटा जिला (UP)
- करमदंड अभिलेख: फैजाबाद (UP)
- तुमैन अभिलेख: ग्वालियर (MP)
- मंदसौर अभिलेख: मालवा (MP)
- गढ़वा अभिलेख: प्रयागराज (UP)
नोट: मंदसौर अभिलेख का अन्य नाम ‘दशपुर अभिलेख’ है। इसका निर्माण ‘वत्सभट्टी’ द्वारा किया गया। इसमें कुमारगुप्त के राज्यपाल ‘बंधुवर्मा’ का वर्णन है। ‘धनैदह ताम्रपत्र’ और ‘दामोदरपुर ताम्रपत्र’ अभिलेख बांग्लादेश से प्राप्त हुए हैं (इनमें शासन व्यवस्था का वर्णन है)।
स्कंदगुप्त
- यह कुमारगुप्त के पुत्र थे। इनके शासनकाल में भारत पर हूणों ने आक्रमण प्रारंभ किया।
- इसने भारत से हूणों को पराजित करके भगाया। हूणों का राजा ‘खुशनवाज’ था।
- भितरी स्तंभलेख: गाजीपुर (UP) में स्थित इस अभिलेख का निर्माण स्कंदगुप्त ने करवाया, जिसमें हूणों को पराजित करने की जानकारी है।
- प्रमुख उपाधि: क्रमादित्य, विक्रमादित्य, परमभागवत, देश रक्षक।
💡 परीक्षा उपयोगी विविध तथ्य (VVI Summary)
- गुप्त काल को भारत का स्वर्ण युग ‘K.M. मुंशी’ ने कहा है।
- गुप्त काल को ‘परिवर्तन की दहलीज’ इतिहासकार ‘रोमिला थापर’ ने कहा है।
- गुप्त काल में राजस्व की दर 1/6 होती थी।
- गुप्त काल में ‘भोग’ का अर्थ भूमि कर (Land Tax) से था।
- गुप्त काल में सिक्कों पर मयूर का चित्र कुमारगुप्त ने अंकित करवाया था।
- गुप्त काल में शिक्षा का प्रमुख केंद्र नालंदा था।