19. दक्षिण भारत का इतिहास: चोल वंश

चोल वंश का उदय: 9वीं शताब्दी के आस-पास दक्षिण भारत में चोल वंश का उदय हुआ। चोल वंश की स्थापना विजयालय ने की थी। ये शुरुआत में पल्लवों के सामंत थे। सभी चोल राजा शैव धर्म के अनुयायी थे।

A. प्रारंभिक जानकारी एवं इतिहास के स्रोत

  • राजधानी: चोल वंश की प्रारंभिक राजधानी तंजौर (तमिलनाडु) थी और उप-राजधानी कांचीपुरम थी।
  • राजकीय भाषा: तमिल, तेलुगु, कन्नड़, और संस्कृत।
  • स्वर्ण युग: चोल वंश के समय को ‘तमिल साहित्य का क्लासिक युग’ कहा जाता है।
  • मुद्रा (सिक्के): चोलों की मुद्राओं पर धनुष, बाघ और मछली का चित्र अंकित था।

चोल इतिहास की जानकारी के प्रमुख अभिलेख

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अभिलेख का नाम संबंधित शासक
तिरुवलंगाडु का अभिलेखराजेन्द्र I
करंदई दान पत्र अभिलेखराजेन्द्र I
उत्तराममेरुर अभिलेखपरान्तक I
तिरुवेंदिपुरम अभिलेखराजराज तृतीय
तंजौर मंदिर अभिलेखराजराज प्रथम
मणिमंगलम अभिलेखराजाधिराज प्रथम

नोट: अशोक के दुसरे एवं सातवें अभिलेख से भी चोल वंश की जानकारी मिलती है।

प्रमुख साहित्यिक स्रोत (पुस्तकें)

  • कलिंगतुपर्णी: जयगोंदर की पुस्तक
  • पेरिया पुराणम्: सेक्किलार की पुस्तक
  • वीरशोलियम: बुद्धमित्र की पुस्तक
  • जीवक चिंतामणि: तिरुतक्कदेवर की पुस्तक

B. चोल वंश के प्रारंभिक शासक

1. विजयालय (850 – 871 ई.)

  • यह चोल वंश का संस्थापक था और शैव धर्म का अनुयायी था।
  • इसी ने तंजौर को राजधानी बनाया था।
  • तंजौर में इसने ‘निशुंभ सूदिनी देवी’ (पार्वती जी) का मंदिर बनवाया।
  • उपाधि: ‘नरकेसरी’।

2. आदित्य प्रथम (871 – 907 ई.)

  • इन्हें चोल वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
  • यह चोल वंश का ‘प्रथम स्वतंत्र राजा’ था।
  • प्रमुख उपाधियां: कोदंडराम, राजकेसरी, राजकेसरी बर्मन।

3. परान्तक प्रथम

  • यह आदित्य I का पुत्र था। प्रमुख उपाधियां: मदुरैकोंड, वीरनारायण, वीरवत्सल, वीरचोल।
  • तंजौर का चिदम्बरम मंदिर इसी ने बनवाया था। नटराज की प्रतिमा पर सोने का छत भी इसी ने बनवाया।
  • वेलुर का युद्ध: इस युद्ध में परान्तक I ने पाण्ड्य राजाओं को पराजित किया था।
  • इनके प्रसिद्ध दरबारी कवि ‘वेंकट माधव’ थे।
  • इन्होंने दो यज्ञ करवाए: ‘हेमगर्भ यज्ञ’ और ‘तुलाभार यज्ञ’।
  • तक्कोलम का युद्ध: इस युद्ध में राष्ट्रकूट राजा इन्द्र III (कृष्ण III) ने परान्तक प्रथम को पराजित कर दिया था।

C. चोल वंश के महानतम शासक

4. राजराज प्रथम (985 – 1014 ई.)

  • पिता का नाम- उत्तम चोल, माता का नाम- वानवन देवी।
  • प्रमुख उपाधियां: मुम्माडीचोल, शिवपादशेखर, मुरलीधर, अरमोलीवर्मन, राजामार्तण्ड, सिंहलांतक, कुलान्तक।
  • इनके गुरु का नाम ‘करुवर’ था।
  • बृहदेश्वर मंदिर: तंजौर के इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण इन्होने ही करवाया था (अन्य नाम: राजराजेश्वर मंदिर, राजसिदेश्वर मंदिर)। तंजौर में ‘चोलेश्वर मंदिर’ का निर्माण भी किया।
  • दक्षिण भारत में नौसेना (Navy) का निर्माण करने वाला प्रथम राजा राजराज प्रथम ही था।
  • श्रीलंका विजय: श्रीलंका के अनुराधापुर वाले क्षेत्र पर कब्जा किया। ‘पोलन्नरुआ’ को अपनी राजधानी बनाया। समस्त उत्तरी श्रीलंका के क्षेत्र को ‘जयनाथ मण्डल’ कहा जाता है।
  • इसने केरल एवं मालदीव पर भी कब्ज़ा किया था।
  • चोल वंश में पहली बार ‘भूमि की माप’ इसी ने करवाई और भूमि की उर्वरता बढ़ाने पर जोर दिया।
  • नागपट्टनम में ‘वैष्णव मंदिर’ बनवाया।

5. राजेन्द्र चोल (1014 – 1044 ई.)

यह चोल वंश का सबसे महानतम एवं प्रतापी राजा था। इनके गुरु का नाम ‘इशान शिव’ था।

  • इतिहासकार ‘स्मिथ’ ने इन्हें ‘दक्षिण भारत का नेपोलियन’ कहा। इनकी विजय तुलना सिकंदर से ‘नीलकंठ शास्त्री’ ने की।
  • उपाधियां: पण्डित चोल, कडरकोंड, मुंडीगोंड चोल, वीरराजेन्द्र प्रकेसरी बर्मन, गंगेकोंड चोल।
  • बंगाल अभियान: इसने बंगाल पर अभियान किया और वहाँ से जल (गंगा जल) लेकर तमिलनाडु आया और ‘गंगैकोंड चोल पुरम’ शहर की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।
  • इसने कलिंग (उड़ीसा) पर भी विजय प्राप्त की।
  • इसने सम्पूर्ण श्रीलंका पर विजय किया एवं वहाँ के राजा ‘महेन्द्र पंचम’ को पराजित किया।
  • केरल के चेर शासक और मदुरै के पाण्ड्य शासक को हराया।
  • अरब सागर में ‘नौसेना’ का निर्माण किया।
  • राजेन्द्र चोल ने अपना दूत मंडल ‘चीन’ भेजा और कंबोडिया देश से व्यापारिक संबंध स्थापित किए।
  • सिंचाई के लिए तालाब एवं नहर बनवाये और शिक्षा के विकास के लिए विद्यालय का निर्माण किया।

D. चोल प्रशासन एवं समाज

  • चोल प्रशासन में अंतिम निर्णय राजा का होता था। राजा की तुलना ‘देवता’ से की जाती थी।
  • राजा को ‘पेरुमाल’ शब्द से संबोधित किया जाता था और राजा का पद वंशानुगत होता था। राजा के पुत्र को ‘युवराज’ कहते थे।
  • चोल प्रशासन ‘केन्द्रीयकरण एवं विकेन्द्रीयकरण’ दोनों पर आधारित था।
  • स्थानीय स्वशासन (Local Self Government): चोल प्रशासन की सबसे बड़ी विशेषता स्थानीय स्वशासन थी। इसकी विस्तृत जानकारी ‘उत्तराममेरुर अभिलेख’ से मिलती है।
  • समाज में ‘देवदासी’ एवं ‘दास प्रथा’ का प्रचलन था।
  • केन्द्रीय पदाधिकारी: उच्च अधिकारियों को ‘पेरुन्दनम’ कहा जाता था (ये वर्तमान IAS रैंक के होते थे)।
  • दक्षिण भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य चोल साम्राज्य ही था। चोल वंश के अंतिम राजा ‘राजेन्द्र III’ थे।

💰 अर्थव्यवस्था एवं मुद्रा

  • स्वर्ण मुद्रा: चोलों की मुख्य स्वर्ण मुद्रा को ‘कासु’ कहा जाता था।
  • भूमि कर (Land Tax): चोल काल में भूमि कर 1/3 भाग लिया जाता था।

E. मंदिर निर्माण की तीन प्रमुख शैलियाँ (Art & Culture)

प्राचीन भारत में मंदिर निर्माण की मुख्य रूप से 3 शैलियां विकसित हुईं: नागर, बेसर और द्रविड़। चोल काल में बने मंदिरों में तमिल तथा संस्कृत भाषा का प्रयोग हुआ है।

1. नागर शैली (Nagara Style)

  • विस्तार: कश्मीर से लेकर विंध्य क्षेत्र तक।
  • प्रमुख मंदिर: गुप्त काल के मंदिर (दशावतार मंदिर), उड़ीसा के सूर्य या पगोडा मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, लिंगराज मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, खजुराहो मंदिर (MP), और पुष्कर मंदिर।

2. बेसर शैली (Vesara Style)

  • विस्तार: विंध्य पर्वत से लेकर कृष्णा नदी के क्षेत्र तक।
  • प्रमुख मंदिर: राष्ट्रकूटों का मंदिर (एलोरा का कैलाश मंदिर), होयसल मंदिर (हम्पी, बेलुर, कर्नाटक), और वृन्दावन का वैष्णव मंदिर।

3. द्रविड़ शैली (Dravidian Style)

  • विस्तार: कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक (मुख्यतः दक्षिण भारत)।
  • प्रमुख मंदिर: पल्लव शासकों के मंदिर, चोल शासकों के मंदिर, पाण्ड्य शासकों के मंदिर, और काकतीय वंश के मंदिर।