11. जैन धर्म (Jainism) – संपूर्ण विवरण

जैन धर्म का परिचय: जैन धर्म संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसकी उत्पत्ति ‘जीन’ शब्द से हुई है। जीन का मतलब ‘विजेता’ होता है। जैन धर्म के अन्य नाम: यापनीय धर्म, कूर्चक धर्म, श्वेतपट धर्म, और निर्ग्रंथ धर्म हैं।

A. तीर्थंकर एवं शलाका पुरुष

  • जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर का मतलब है- ‘जो भवसागर को पार करवा दें’ अथवा ‘जो जीवन को प्रकाश की ओर ले जाय’।
  • 1 से लेकर 22 तक के तीर्थंकर को ‘अनैतिहासिक तीर्थंकर’ कहा जाता है।
  • 23वें एवं 24वें तीर्थंकर को ‘ऐतिहासिक तीर्थंकर’ कहा जाता है।
  • शलाका पुरुष: वैसे जैन तीर्थंकर जो अपना पूरा जीवन जैन धर्म को आगे बढ़ाने में समर्पित कर दिये हों, उन्हें शलाका पुरुष कहा जाता है।
  • शलाका पुरुषों की कुल संख्या 63 है। केवल पुरुष ही शलाका हो सकते हैं, महिला नहीं।

B. प्रथम एवं 23वें तीर्थंकर

1. ऋषभदेव / आदिनाथ (प्रथम तीर्थंकर)

  • जैन धर्म की स्थापना ऋषभदेव (आदिनाथ) ने की थी।
  • पारिवारिक विवरण: मूल निवास स्थान- अयोध्या, पिता- नाभिराजा, माता- मरुदेवी, पत्नी- नंदा/सुनंदा।
  • ऋषभदेव के बारे में विवरण ऋग्वेद में मिलता है।
  • माना जाता है कि इनके 100 पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े लड़के ‘भरत’ के नाम पर ही देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा।
  • इनके एक और पुत्र बाहुबली थे, जिनके सम्मान में कर्नाटक में चामुण्डराय ने ‘गोमतेश्वर की प्रतिमा’ बनवाई।
  • भागवत पुराण में इन्हें ‘विष्णु का 24वाँ अवतार’ और लिंगपुराण में ‘शिव का 28वाँ अवतार’ बताया गया है।
  • 2 अप्रैल को ऋषभदेव की जयंती मनाई जाती है।

2. पार्श्वनाथ (23वें तीर्थंकर)

  • पारिवारिक विवरण: जन्म- काशी (बनारस), पिता- अश्वसेन, माता- वामादेवी, पत्नी- प्रभावती देवी।
  • ये इक्ष्वाकु वंश के राजा थे और 30 वर्ष की आयु में इन्होंने गृहत्याग किया था।
  • झारखण्ड में सम्मेद पर्वत पर 83 दिन की कठिन तपस्या के बाद इन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।
  • ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् इन्हें ‘पुरसाद नियम’ और ‘महान पुरुष निग्रंथी’ कहा गया।
  • इनके प्रमुख अनुयायी ‘गांगेय’ एवं ‘पुष्पचुला’ थे।
  • इन्होंने अपना पहला उपदेश महावीर के माता-पिता को दिया था।
  • चातुर्याम शिक्षा: इन्होंने 4 शिक्षाएं दीं- सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी नहीं करो), अपरिग्रह (आवश्यकता से ज्यादा धन मत रखो)।
  • विचार: ये वैदिक कर्मकांडों, पूजावाद और जातिप्रथा के बहुत बड़े विरोधी थे।

C. महावीर स्वामी (24वें तीर्थंकर)

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बचपन का नामवर्धमानजन्म540 ई.पू. वैशाली (कुण्डग्राम)
पिता का नामसिद्धार्थमाता का नामत्रिशला (लिच्छवी राजा चेटक की बहन)
वंशजांत्रिक वंशबड़े भाईनंदीवर्धन
पत्नी का नामयशोदापुत्री का नामअनोजा प्रियदर्शनी
बहन का नामसुदर्शनादामाद (सुदर्शना का पुत्र)जामील

गृहत्याग एवं ज्ञान प्राप्ति (कैवल्य)

  • महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया था।
  • गृहत्याग के बाद वे सीधे नालंदा पहुँचे जहाँ उनकी मुलाकात ‘मक्खलिपुत गोसाल’ से हुई।
  • दोनों ने लगातार 6 वर्ष तक कठिन तपस्या की, लेकिन बाद में मतभेद होने के कारण दोनों अलग-अलग हो गए।
  • इसके बाद महावीर राजगीर पहुँचे और 6 साल लगातार तपस्या की।
  • ज्ञान प्राप्ति: 42 साल की उम्र में (वैशाख पूर्णिमा का 10वाँ दिन) ऋजुपलिका नदी के तट पर, जाम्भिक ग्राम (राजगीर) में बरगद वृक्ष के नीचे इन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई।
  • ज्ञान प्राप्ति की घटना को जैन धर्म में ‘कैवल्य’ कहा गया।
  • ज्ञान प्राप्ति के बाद इन्हें अलग-अलग नामों से जाना गया: जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य/श्रेष्ठ), और निर्ग्रंथ (बंधनहीन)।
  • बौद्ध ग्रंथों में महावीर का नाम ‘निगंठनाथपुत’ मिलता है।

उपदेश एवं वर्षावास

  • ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महावीर ने अपना पहला उपदेश राजगीर में विपुलाञ्चल पर्वत पर अपने दामाद (जामील) को दिया।
  • महावीर ने अपना उपदेश प्राकृत / अर्धमागधी भाषा में दिया।
  • इन्होंने अपनी पहली शिष्या ‘चंदना’ को बनाया (जो अंग नरेश दधिवाहन की लड़की थी)।
  • महावीर ने अपना प्रथम वर्षावास आस्तिक ग्राम (वैशाली) में किया और 1 साल लगातार ठहरे।
  • महावीर स्वामी ने अपना अंतिम वर्षावास पावापुरी में किया।

D. महावीर स्वामी द्वारा दी गई शिक्षाएं

महावीर के शिक्षा का विशेष नाम ‘पंच महाव्रत’ है।

  • 1. त्रिरत्न शिक्षा: सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, और सम्यक् आचरण।
    (5 ज्ञान: श्रुति ज्ञान, मति ज्ञान, अवधि ज्ञान, मनःपर्याय ज्ञान, कैवल्य ज्ञान)
  • 2. स्यादवाद शिक्षा: किसी भी सत्य के कई पहलु होते हैं लेकिन मनुष्य एक ही पहलु को पकड़े रहता है।
  • 3. पंचमहाव्रत शिक्षा: सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, और ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्य को महावीर ने जोड़ा)।
  • 4. शिक्षाव्रत: इसमें 4 प्रकार की बातें कही गई हैं:
    • I. देशाविरती (मनुष्य अपने जीवन में एक निश्चित सीमा से आगे नहीं जा सकता है)।
    • II. प्रोषधोपवास (तीर्थंकर की बातों को सदाचार पूर्वक पालन करना)।
    • III. वायाव्रत (हर मानव जरुरत मंदों का सहयोग करें)।
    • IV. सामायिक व्रत (मन में आ रही किसी भी प्रकार की गलत इच्छा का त्याग करें)।
  • 5. तीन गुण व्रत शिक्षा: I. कौन सा कार्य करना है पहले तय किजिए, II. कार्य जो आप करने जा रहे हैं वह उचित एवं संवैधानिक होना चाहिए, III. अपने जीवन में मानव को हमेशा भोजन एवं भोग की सीमा निश्चित करना चाहिए।
  • 6. कायाक्लेश शिक्षा: इसमें दो प्रथाओं का ध्यान रखा जाता है:
    • संलेखना प्रथा: अगर किसी भी जैन संत को मृत्यु चाहिए तो वह केवल जल ग्रहण करेगा।
    • संथारा प्रथा: न ही जल और ना ही अन्न ग्रहण किया जाता है।

E. प्रमुख जैन संगीतियां

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संगीति समय व स्थान अध्यक्ष प्रमुख कार्य / विशेषता
प्रथम जैन संगीति चौथी शताब्दी ई.पू. (पाटलिपुत्र) स्थूलभद्र • 12 अंगों का संकलन।
• जैन धर्म का श्वेताम्बर एवं दिगम्बर में विभाजन।
दुसरा जैन संगीति 512 ई. (वल्लभी, गुजरात) क्षमाश्रवण • 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेद सूत्र, 4 मूल सूत्र की रचना हुई।
जैन साहित्य (आगम) की रचना हुई।

F. श्वेताम्बर एवं दिगम्बर सम्प्रदाय

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श्वेताम्बर दिगम्बर
संस्थापक: स्थूलभद्र।
• ये श्वेत वस्त्र धारण करते थे।
• यती, आचार्य, साधु श्वेताम्बर जैनी थे।
• ये लोग भोजन को आवश्यक समझते थे।
• इनका मत था कि महावीर विवाहित थे।
• ये लोग जैन साहित्य ‘आगम’ में विश्वास करते थे।
• ये लोग 19वें तीर्थंकर मल्लीनाथ को महिला मानते हैं।
उपसम्प्रदाय: पुजेरा, ढुंढिया, विरतोला।
संस्थापक: भद्रबाहु।
• ये लोग नग्न रहते थे।

• ये लोग भोजन को आवश्यक नहीं समझते थे।
• ये लोग महावीर को अविवाहित मानते थे।
• ये लोग आगम में विश्वास नहीं करते थे।
• ये लोग मल्लीनाथ को पुरुष मानते हैं।
उपसम्प्रदाय: बिसपंधी, तोतापंथी, तारणपंधी, गुमनाम पंथी, तेरापंथी।

G. 24 तीर्थंकरों के प्रतीक चिन्ह (VVI)

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क्रम तीर्थंकर प्रतीक चिन्ह क्रम तीर्थंकर प्रतीक चिन्ह
1ऋषभदेववृषभ (बैल)13विमलनाथसुअर
2अजितनाथहाथी14अनंतनाथसेही (गदहा)
3संभवनाथघोड़ा15धर्मनाथवज्रदंड
4अभिनंदननाथबंदर16शांतिनाथमृग (हिरण)
5सुमतीनाथचकवा17कुंथुनाथबकरा
6पदमप्रभकमल18अरहनाथमछली
7सुपार्श्वनाथस्वास्तिक19मल्लीनाथकलश
8चन्द्रप्रभचन्द्रमा20मुनिसुव्रत नाथकछुआ
9पुष्पदंतमगर21नेमिनाथनीलकमल
10शीतलनाथकल्पवृक्ष22अरिष्टनेमिशंख
11श्रेयांसनाथगेंडा23पार्श्वनाथसर्प का फन
12वासुपूज्यभैंसा24महावीरसिंह

💡 परीक्षा उपयोगी विविध तथ्य (One-Liners)

  • महावीर स्वामी ने ‘जियो एवं जीने दो’ का नारा दिया।
  • महावीर स्वामी का प्रधान उपदेश – ‘आत्मत्व ही परमात्मा है’।
  • मथुरा से प्राचीन जैन स्तूप एवं जैन मूर्ति का प्रमाण मिला है।
  • चौसा से काँस्य धातु का ऋषभदेव का जैन मूर्ति मिला है।
  • अयोध्या से टेराकोटा का जैन मूर्ति का प्रमाण मिला है।
  • पटना लोहानीपुर से जैन तीर्थंकर की प्राचीन मूर्ति मिला है।
  • उड़ीसा के उदयगिरी एवं खंडगिरी से जैन गुफाएँ प्राप्त हुआ है। जैनों के लिए कलिंग नरेश खारवेल ने गुफाएं प्रदान किया।
  • जैन धर्म के प्रचार के लिए महावीर स्वयं दक्षिण ऐरिया का यात्रा किये।
  • जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत अहिंसा है।
  • माउण्ट आबू का दिलवाड़ा मंदिर जैन धर्म का प्रमुख स्थल है (इसे तेजपाल राजा द्वारा बनाया गया)।
  • महावीर का 2600वाँ जन्मदिवस 2000 ई. में मनाया गया।
  • महावीर एवं बुद्ध दोनों ने बिम्बिसार के शासन काल में उपदेश दिये।
  • जैन मठ संस्थानों को ‘वसादिस्’ कहा जाता है।
  • मुदविदर – ‘जैन काशी’ के नाम से प्रसिद्ध है।
  • जैन ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ के लेखक अद्योतनसूरी है।
  • कल्पसूत्र में बताया गया है कि महावीर एवं पार्श्वनाथ दोनों क्षत्रिय थे।
  • जैन धर्म में एकमात्र महिला तीर्थंकर मल्लीनाथ थीं (श्वेताम्बर मान्यता अनुसार)।
  • भद्रबाहु द्वारा जैन धर्म को दक्षिण भारत में लाया गया।
  • चतुर्विधि संघ की स्थापना पावापुरी में महावीर स्वामी ने किया।
  • वीर निर्वाण युग – जैन धर्म से संबंधित है।
  • महावीर स्वामी के भिक्षुणी संघ की प्रधान चंदना थी।
  • ‘समरादित्य कथा’ का संबंध जैन धर्म से है।
  • कुचक सम्प्रदाय का संबंध जैन धर्म से है।