3. नवपाषाण काल और ताम्रपाषाण संस्कृतियां

नवपाषाण काल (Neolithic Age): यह पाषाण काल का अंतिम चरण था। इस काल में मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आए। मानव अब केवल शिकारी नहीं रहा, बल्कि उसने खाद्य उत्पादक (Food Producer) की भूमिका अपना ली। ‘नवपाषाण’ (Neolithic) शब्द का प्रयोग सबसे पहले सर जॉन लुबॉक ने 1865 में अपनी पुस्तक ‘प्रीहिस्टोरिक टाइम्स’ में किया था।

A. नवपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं

  • कृषि की शुरुआत: मानव ने खेती करना प्रारंभ कर दिया। सबसे पहले उगाई जाने वाली फसलें गेहूँ और जौ थीं।
  • स्थायी निवास: खेती की देखभाल के लिए मानव को एक ही जगह रुकना पड़ा, जिससे स्थायी बस्तियों (गाँवों) का विकास हुआ।
  • पहिए का आविष्कार: इतिहास की सबसे बड़ी खोज ‘पहिए (Wheel)’ का आविष्कार इसी काल में हुआ। इसका उपयोग बर्तन बनाने और यातायात के लिए किया गया।
  • पॉलिशदार औजार: पत्थर के औजारों को अधिक धारदार बनाने के लिए उन पर पॉलिश की जाने लगी। ‘सेल्ट (Celt)’ इस काल का प्रमुख औजार था।
  • आग का व्यापक उपयोग: भोजन पकाने और मिट्टी के बर्तनों को भट्ठे में पकाने के लिए आग का नियमित उपयोग शुरू हुआ।

नवपाषाण काल के प्रमुख स्थल एवं साक्ष्य (VVI)

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प्रमुख स्थल (स्थान) प्राप्त महत्वपूर्ण साक्ष्य / प्रमाण
मेहरगढ़ (बलूचिस्तान, पाकिस्तान) यहाँ से कृषि (गेहूँ व जौ) के प्राचीनतम साक्ष्य और स्थायी जीवन के प्रथम प्रमाण मिले हैं। इसे ‘ब्रेड बास्केट’ भी कहा जाता है।
बुर्जहोम (कश्मीर) यहाँ से गर्तवास (गड्ढे वाले घर) और मालिक के साथ कुत्ते को दफनाने का साक्ष्य मिला है।
गुफ्फकराल (कश्मीर) इसका अर्थ है ‘कुम्हार की गुफा’। यहाँ से कृषि, पशुपालन और गर्तवास के साक्ष्य मिले हैं।
कोल्डीहवा (प्रयागराज, UP) यहाँ से विश्व में चावल (धान) की खेती के सबसे प्राचीन साक्ष्य (लगभग 6500 ई.पू.) प्राप्त हुए हैं।
चिरांद (सारण, बिहार) यह एकमात्र स्थल है जहाँ से प्रचुर मात्रा में हड्डी के उपकरण (मुख्यतः हिरण के सींग के) मिले हैं।
संगनकल्लू और पिक्लीहल (कर्नाटक) दक्षिण भारत के इन स्थलों से राख के टीले (Ash Mounds) प्राप्त हुए हैं, जो उस समय के पशुबाड़ों (गोबर जलाने) के प्रमाण हैं।

B. ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age)

नवपाषाण काल के अंत में धातुओं का प्रयोग शुरू हुआ। मानव द्वारा खोजी और उपयोग की गई पहली धातु ‘तांबा (Copper)’ थी। जिस काल में मनुष्य ने पत्थर और तांबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग किया, उसे ताम्रपाषाणिक (Chalcolithic) काल कहते हैं।

ताम्रपाषाण काल की विशेषताएं

  • ग्रामीण सभ्यता: ताम्रपाषाणिक संस्कृतियां मुख्य रूप से ग्रामीण (Rural) थीं (सिंधु घाटी की तरह शहरी नहीं)।
  • मृदभांड (Pottery): ये लोग मुख्य रूप से काले और लाल रंग के मृदभांड (Black & Red Ware) का प्रयोग करते थे, जिन पर सफेद रंग से चित्रकारी होती थी।
  • मातृदेवी की पूजा: वृषभ (सांड) और मातृदेवी की पूजा के साक्ष्य मिलते हैं। ये लोग पक्की ईंटों से परिचित नहीं थे, घरों का निर्माण मिट्टी और घास-फूस से होता था।

प्रमुख ताम्रपाषाणिक संस्कृतियां (Regional Cultures)

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संस्कृति का नाम प्रमुख स्थल / राज्य महत्वपूर्ण साक्ष्य / विशेषता
आहार संस्कृति आहार, गिलुंद (राजस्थान) आहार का प्राचीन नाम ‘ताम्बवती’ (तांबे वाली जगह) था। यहाँ काले-लाल मृदभांड मिले हैं।
मालवा संस्कृति नवदाटोली, एरण (मध्य प्रदेश) मालवा के मृदभांड ताम्रपाषाण काल में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। नवदाटोली (उत्खनन: H.D. सांकलिया) से सबसे अधिक फसलों के साक्ष्य मिले हैं।
जॉर्वे संस्कृति इनामगाँव, दैमाबाद (महाराष्ट्र) इनामगाँव एक बड़ी बस्ती थी, जहाँ से किलेबंदी और वर्ग विभाजन के साक्ष्य मिले हैं। दैमाबाद इस काल का सबसे बड़ा स्थल है, जहाँ से कांसे का रथ मिला है।

💡 परीक्षा उपयोगी सार (Quick Revision Facts)

  • कृषि का प्रथम साक्ष्य: मेहरगढ़ (गेहूँ और जौ)।
  • पहिए का आविष्कार: नवपाषाण काल में।
  • मानव द्वारा प्रयुक्त प्रथम धातु: तांबा (Copper)।
  • चावल का प्राचीनतम साक्ष्य: कोल्डीहवा (उत्तर प्रदेश)।
  • मालिक के साथ कुत्ता दफनाने का साक्ष्य: बुर्जहोम (कश्मीर)।
  • ताम्बवती के नाम से प्रसिद्ध स्थल: आहार (राजस्थान)।