11. समास (Compound)

सम् + आस = समास
शाब्दिक अर्थ: संक्षेप
  • दो या दो से अधिक पदों/शब्दों को जोड़कर एक नया पद/शब्द बनाना समास कहलाता है।
  • जैसे -> ज्ञान का सागर = ज्ञानसागर (संक्षेप)
  • जैसे -> चक्र है जिसके हाथ में = चक्रपाणि (संक्षेप)

(सन्धि = मेल/जोड़ – दो समीपवर्ती वर्णों का मेल)

समास विग्रह: किसी भी सामासिक पद को अलग-अलग करना।

समास -> समास विग्रह
चन्द्रशेखर -> चन्द्र है जिसके शिखर पर
यथाशक्ति -> शक्ति के अनुसार

अंतर (सन्धि vs समास)

सन्धि समास
• दो वर्णों का मेल
• शाब्दिक अर्थ – मेल/जोड़
• अलग-अलग करना – सन्धि विच्छेद
• दो पदों/शब्दों का मेल
• अर्थ – संक्षेप
• अलग-अलग करना – विग्रह

समास के भेद/प्रकार – 6 (संक्षिप्त परिचय)

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. कर्मधारय
  4. द्विगु समास
  5. द्वन्द्व समास
  6. बहुव्रीहि समास
  • अव्ययीभाव समास: पूर्व पद प्रधान, प्रथम पद अव्यय, पहला पद उपसर्ग।
    Ex— आजन्म, आजीवन, यथाशक्ति, प्रतिदिन
  • तत्पुरुष समास: उत्तर पद प्रधान, विभक्ति चिन्ह का लोप।
    Ex— राजपुत्र, विद्यालय, शिवालय
  • कर्मधारय समास: विशेषण विशेष्य सम्बन्ध।
    Ex— महापुरुष, महात्मा, नीलगाय
  • द्विगु समास: जब भी किसी का अनेक उदाहरण हो, प्रथम पद संख्यावाची।
    Ex— त्रिभुज, सप्ताह, शताब्दी
  • द्वन्द्व समास: दोनो पद प्रधान | सामासिक चिन्ह।
    Ex— माता-पिता, दिन-रात, पति-पत्नी
  • बहुव्रीहि समास: अन्य पद | तीसरा पद प्रधान।
    Ex— दशानन, त्रिनेत्र, चक्रपाणि

समास का विस्तृत वर्णन

1. अव्ययीभाव समास
  • जिस समास का पूर्व पद प्रधान होता है।
  • इसमें पूर्व पद उपसर्ग होता है। जो कि अव्यय के रूप में प्रयोग किया जाता है। (अव्यय -> जिस पर लिंग, वचन, काल, आदि के परिवर्तन का कोई प्रभाव न पड़े)
  • आ, प्रति, यथा, भर….
  • जैसे -> यथाशक्ति, यथाशीघ्र, भरपेट (उपसर्ग), आजीवन (आ+जीवन)
  • जहाँ भी कार्य की सातत्यता का बोध – यथोचित हो तो अव्ययीभाव होगा।
2. तत्पुरुष समास
  • इस समास का द्वितीय/उत्तर पद प्रधान होता है।
  • इसके अन्तर्गत समास करने पर विभक्ति चिन्ह का लोप हो जाता है।
  • समास का विग्रह करने पर (विभक्ति चिन्ह प्राप्त) होता है।
  • जैसे -> राजपुत्र => राजा का पुत्र, देशप्रेम => देश के लिए प्रेम, राजधर्म => राज का धर्म, विद्यालय => विद्या का आलय
तत्पुरुष समास के भेद (कारक चिन्हों के आधार पर)

कारक – 8 (प्रथमा से सप्तमी + सम्बोधन) -> प्रथमा कर्ता (X), 6-तत्पुरुष के भेद, सम्बोधन (X)

  • कर्म तत्पुरुष / द्वितीया तत्पुरुष – (को):
    जैसे -> सुखप्राप्त -> सुख को प्राप्त, माखनचोर -> माखन को चुराने वाला, मोक्षप्राप्त -> मोक्ष को प्राप्त, गगनचुम्बी -> गगन को चुमने वाला, चिड़ीमार -> चिड़ियों को मारने वाला, पॉकेटमार -> जेब को कतरने वाला।
  • करण / तृतीया तत्पुरुष – से (साधन के रूप में), के द्वारा:
    जैसे -> तुलसीकृत -> तुलसी के द्वारा कृत/रचित, रोगग्रस्त -> रोग से ग्रस्त, शोकाकुल -> शोक से आकुल, हस्तलिखित -> हस्त से लिखित, चिंतायुक्त -> चिंता से युक्त, ऋणयुक्त -> ऋण से युक्त।
  • सम्प्रदान तत्पुरुष / चतुर्थी विभक्ति – के लिए / को:
    जैसे -> राहखर्च -> राह के लिए खर्च, स्वदेश प्रेम -> स्वदेश के लिए प्रेम, सभाभवन -> सभा के लिए भवन, देशभक्ति -> देश के लिए भक्ति, गौशाला -> गौ के लिए शाला, गुरुदक्षिणा -> गुरु के लिए दक्षिणा, युद्धभूमि -> युद्ध के लिए भूमि।
  • आपादान / पंचमी तत्पुरुष – से (अलग/जुदाई के अर्थ में):
    जैसे -> पथभ्रष्ट -> पथ से भ्रष्ट, धर्मभ्रष्ट -> धर्म से भ्रष्ट, नेत्रहीन -> नेत्र से हीन, चिंतांमुक्त -> चिंताओं से मुक्त, रोगमुक्त -> रोग से मुक्त, दोषमुक्त -> दोष से मुक्त, ऋणमुक्त -> ऋण से मुक्त।
  • सम्बन्ध / षष्ठी तत्पुरुष – का, की, के:
    जैसे -> राजपुत्र -> राजा का पुत्र, गंगाजल -> गंगा का जल, सूर्योदय -> सूर्य का उदय, लोकनायक -> लोक का नायक, राजभवन -> राजा का भवन, सूर्योपासना -> सूर्य की उपासना, राजरानी -> राजा की रानी।
  • अधिकरण / सप्तमी तत्पुरुष – में / पर:
    जैसे -> पुरुषसिंह -> पुरुष में सिंह, नगरप्रवेश -> नगर में प्रवेश, पुरुषोत्तम -> पुरुषों में उत्तम, आपबीती -> आप पर बीती, घुड़सवार -> घोड़े पर सवार।
3. कर्मधारय समास
  • इस समास का द्वितीय पद प्रधान होता है।
  • इसके दोनो पदो में विशेषण-विशेष्य का सम्बन्ध पाया जाता है। (विशेषण -> जिन शब्दों की सहायता से विशेषता बतायी जाय | विशेष्य -> जिसकी विशेषता बतायी जाय)
  • जैसे -> काली मिर्च, नीलगाय -> नीली है जो गाय, महाकवि
  • महापुरुष – महान है जो पुरुष
  • महात्मा – महान है जो आत्मा
  • परमेश्वर – परम ही जो ईश्वर
4. द्विगु समास
  • इस समास का प्रथम पद संख्यावाची विशेषण होगा।
  • जैसे -> त्रिभुज – तीन भुजाओं का समाहार, चवन्नी – चार आनों का समाहार, दुपट्टा – दो पदों का समाहार, सतसई – सात सौ दोहों का समूह, सप्ताह – सात दिनो का समूह, चौराहा – चार राहों का समाहार।
5. द्वन्द्व समास
  • दोनो पद एक-दूसरे के विपरीतार्थक होते है। दोनो पद प्रधान होते हैं। सामासिक चिन्ह का प्रयोग।
  • जैसे -> माता – पिता, पुत्र – पुत्री, भोजन – पानी
इतरेतर द्वन्द्व समाहार द्वन्द्व व्यतिरेक / वैकल्पिक द्वन्द्व
तथा, और, एवं का प्रयोग।
Ex-> राम – लक्ष्मण
उसी के समान अन्य अर्थ (वर्ग)।
Ex-> दाल-रोटी, भोजन, पैसा
अथवा, या का प्रयोग।
Ex-> पाप-पुण्य
6. बहुव्रीहि समास
  • इस समास के दोनो पद अप्रधान होते हैं। कोई अन्य या तीसरा पद प्रधान होता है।
  • जैसे -> चक्रपाणि -> चक्र है जिसके हाथ में अर्थात् विष्णु, त्रिनेत्र – तीन है नेत्र जिसके अर्थात् शिव, दशानन – रावण, पिताम्बर – विष्णु।

🌟 Exam Special: समास के गूढ़ उप-भेद (Advanced)

प्रो-टिप: सिविल सेवा और RO/ARO की परीक्षाओं में सामान्य भेदों के अलावा तत्पुरुष समास के कुछ संस्कृत-निष्ठ उप-भेद सीधे तौर पर पूछे जाते हैं।
  • 1. नञ् तत्पुरुष (Negative): जहाँ पहला पद निषेधात्मक या नकारात्मक (अ, अन्, न, ना, गैर) हो।
    Ex— अज्ञान (न ज्ञान), अनदेखा (न देखा), नापसंद, अनादि, गैरवाजिब।
  • 2. अलुक् तत्पुरुष: जहाँ पूर्व पद की विभक्ति का लोप नहीं होता है। (यह संस्कृत के शब्दों में होता है)।
    Ex— युधिष्ठिर (युद्ध में स्थिर रहने वाला), खेचर (आकाश में विचरने वाला), मनसिज (मन में उत्पन्न होने वाला – कामदेव)।
  • 3. लुप्तपद / मध्यमपदलोपी तत्पुरुष: जहाँ विग्रह करने पर बीच के पूरे पद (शब्दों के समूह) का लोप हो जाता है।
    Ex— दहीबड़ा (दही में डूबा हुआ बड़ा), बैलगाड़ी (बैलों से चलने वाली गाड़ी), पवनचक्की (पवन से चलने वाली चक्की)।
  • 4. उपपद तत्पुरुष: जिसका उत्तर पद (बाद वाला) स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त न होकर केवल प्रत्यय की तरह जुड़े।
    Ex— जलद (जल देने वाला), कृतघ्न (उपकार न मानने वाला), नभचर।
💡 Master Rule (कन्फ्यूजन क्लियर)
  • सपरिवार / सदेह: जहाँ ‘स’ (साथ) उपसर्ग लगा हो, वहाँ अव्ययीभाव नहीं बल्कि ‘तुल्ययोग (सह) बहुव्रीहि समास’ होता है।
  • वरीयता क्रम (Priority): यदि ‘पीताम्बर’ या ‘नीलकंठ’ जैसे शब्द परीक्षा में आएं और विकल्प में ‘कर्मधारय’ और ‘बहुव्रीहि’ दोनों हों, तो आयोग हमेशा ‘बहुव्रीहि’ को ही सही मानता है।
  • शब्दों की पुनरावृत्ति: रातों-रात, दिनों-दिन, धीरे-धीरे — योजक चिन्ह (-) होने के बावजूद ये द्वन्द्व नहीं हैं, बल्कि अव्ययीभाव समास हैं।